मंगलवार, १ मार्च, १९१०
मेरे प्रिय भाई,
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.....आपको याद होगा कि लगभग बीस दिन पूर्व मैं माननीय गोखले से मिलने गया था. उन्होंने मेरे सामने 'सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी' में शामिल होने का प्रस्ताव रखा. तभी से इस प्रस्ताव कि व्यवहारिकता सम्बन्धी बातें मेरे मस्तिष्क में चक्कर काटती रहीं, और बीस दिनों तक निरंतर विचार करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि मुझे अपना सर्वस्व देश पर न्यौछावर कर देना चाहिए. मैं जनता हूँ कि मुझसे, जिसपर परिवार कि सारी आशाएँ केन्द्त्रित हैं, ऐसी बातें सुनकर आपको धक्का पहुँचेगा. मैं यह भी जनता हूँ कि मैं परिवार को अपने हाल पर छोड़ता हूँ तो उसे भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा. किन्तु मेरे भाई मुझे अपने भीतर एक उच्चतर तथा और अधिक महत्वपूर्ण आह्वान कि अनुभूति होती है....
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अतः मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि तीस करोर के हित में आप कुर्बानी दें.... श्री गोखले की सोसाइटी में सम्मिलित होने का अर्थ मेरे लिए व्यक्तिगत स्टार पर कोई त्याग नहीं हैं. भले के लिए अथवा बुरे के लिए मुझे ऐसी शिक्षा का लाभ मिला हैं कि मैं स्वयं को किसी भी परिस्थिति के अनुकूल बना सकता हूँ... लेकिन मैं अपने को इस भुलावे में नहीं रख सकता कि मेरे इस उपक्रम में आपका भी कोई त्याग नहीं हैं. आप सबकी मुझसे जो ऊँची आशाएँ हैं, वे एक क्षण में ढह जाएँगी. .. यदि मैं थोडा कमाऊ तो थोडा धन उपार्जन कर लूँगा और कदाचित इस तरह उस तथाकथित समाज में, जहाँ मनुष्य कि महानता उसके ह्रदय कि विशालता से नहीं, वरन उसकी मोती थैली से आंकी जाती हैं, अपने परिवार का स्टार ऊँचा उठाने में समर्थ होऊँगा. किन्तु इस क्षणभंगुर संसार में धन, पद, सम्मान-- सब विलीन हो जाते हैं. धन के साथ साथ हमारी आवश्यकतायें भी बढती जाती हें और यद्द्यापी लोग समझते हें कि धन से उन्हें संतुष्टि होगी, जिन्हें थोडा भी jyan है वे अच्छी तरह जानते हैन कि सुख का स्रोत बहार कहीं नहीं अपने भीतर ही है. एक दरिद्र व्यक्ति अपने थोड़े से रुपयों से ही, लाखों कि संपत्तिवाले धनिक से आशिक संतुष्ट रहता है. इसलिए हम दारिद्र्य से घृणा न करें. संसार के महानतम व्यक्ति आरंभ में अति दरिद्र,उत्पीडित और तिरस्कृत रहे, किन्तु उनपर हँसने या उन्हें सतानेवाले सदा के लिए मिटटी में मिल गए, जबकि सताए व उपहास के पात्र बनाये गए वे व्यक्ति आज लाखों लोगो की स्मृति और ह्रदय में विद्यमान हैं. ...
.. मेरे भाई, आप विश्वास करें की यदि जीवन में मेरी कोई महत्वाकांक्षा रही हैं तो वह यह कि मैं देश के काम आ सकूँ.... .. किन्तु आई.सी.एस. के प्रति मेरी कभी कोई आसक्ति नहीं थी, क्यूंकि मैं जनता था कि इसके चलते मेरे क्रिया कलाप बहुत सिमित हो जाएँगे... ..मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं हैं. सिवाय इसके कि मैं मातृभूमि के काम आ सकूँ. पर मन लिया जाए कि मेरी कोई महत्वाकांक्षा होती भी तो इसके लिए हाई कोर्ट में क्या क्षेत्र हैं? मैं जानता हूँ कि मैं प्रतिमाह कई सौ रुपये अर्जित कर लूँगा. यह आय कई हजार भी हो सकती हैं, किन्तु क्या हजारों, लाखों, और करोरों कि सम्पत्तिवाले ऐसे अनगिनत लोग नहीं है, जिनकी कोई परवाह नहीं करता, और जिन्हें हम भी केवल दया की दृष्टि से देख सकते हैं? पर दूसरी ओर विशाल क्षेत्र पर दृष्टी डालें, किस राजा अथवा जनसाधारण को वह पद, प्रभाव और सम्मान प्राप्त है, जो श्री गोखले को है? और क्या इसके वाबजूद वे एक गरीब आदमी नहीं हैं? हम क्या उनके परिवार से भी अधिक गरीब हैं? यदि लाखों लोग दो तीन रुपये मासिक में गुजर कर सकते हैं तो हम दो-तीन सौ रुपये में क्यों नहीं कर सकते? हमारी महत्त्वाकक्षा को एक विशाल क्षेत्र मिलेगा, जरा इस पर भी ध्यान दें और मुझे शान्ति से जाने दें. यह आपका त्याग होगा और गौरव भी आप ही का....
.. मैंने बीस दिनों तक निरंतर इसपर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि तथाकथित सामाजिक मान मर्यादा, पद-प्रतिष्ठा -- सब निस्सार हैं, मनुष्य कि महानता उसके थैली के वजन पर नहीं, अपितु उसके ह्रदय की विशालता पर निर्भर है, और मुझे विश्वास है की आपका ह्रदय संसार में किसी भी व्यक्ति से काम विशाल नहीं है.
... अतः गरीबी और कुछ समय के लिए सामाजिक हीनता स्वेच्छा से अपनाकर देव्दूत्तुल्या उदारता का परिचय दें. यह दिखाकर की मनुष्य का ह्रदय विशाल व संकल्पशील है, संसार के सम्मुख आप यह सिद्ध कर दें की अभी या उच्च विचारों से रहित नहीं हुआ है. साबित कर दें कि अभी यह उच्च विचारों से रहित नहीं हुआ है. साबित कर दें कि अभी यह उच्च विचारों से रहित नहीं हुआ है. साबित कर दें कि यहाँ ऐसे भी मनुष्य हैं जिनके लिए रूपया-पैसा कुछ नहीं, सेवा ही सबकुछ है. लाखों की और साथ ही अपने निकटतम और प्रियतम बन्धु-बांधवों की अपने प्रति kritajyata अर्जित करें.
.. मैं अपनी पत्नी को भी इस विषय में लिख रहा हूँ माँ को नहीं लिख सकता. इस वृद्धावस्था में इससे उन्हें गहरा धक्का पहुँच सकता है.
आपका स्नेहाधीन,
राजेंद्र प्रसाद
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