Motto

....................Come for Knowledge, go for Service.

Tuesday, August 10, 2010

शिक्षक का स्वभाव

शिक्षक समाज का निर्माता होता हैं, और इस नाते उन्हें समाज का द्रष्टा भी होना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों की समझ के साथ-साथ, उसका उचित आंकलन करने की क्षमता होनी चाहिए। इसी आधार पर वे छात्रों का उचित मार्गदर्शन कर सकेंगे। आज के समाज की कमियों को दूर कर ही कल के नवीन समाज की संरचना हो सकेगी। छात्र नवीन जीवन की कल्पना करे और उसे यथार्थ करने के लिए संकल्पित हो, तभी नवीन समाज की हो payegi।
शिक्षक का व्यवहार मधुर व आदरणीय होना चाहिए। शिक्षक अपने स्वाभाव se स्वतः जनसामान्य se आदर पा लेगा। दुःख होता हैं, जब जनसामान्य शिक्षकों के स्वभाव पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता हैं। दिनांक ९/०८/२०१० को मेरे विद्यालय में नए छात्रों का दाखिला लिया गया। वृक्षारोपण के लिए सभी नए छात्रों से यह अपेक्षा की जाती हैं कि वे अपने साथ दो-दो पेड़ लेकर आये। परिश्थितियां जो भी हो, कुछ लोग बिना पेड़ लिए ही जाते हैं, तो कोई एक ही पेड़ लता हैं। यह दृश्य देखकर कष्ट तो होता हैं।
लेकिन ये सुनकर ओर भी कष्ट होता हैं जब कोई शिक्षक अभिभावक के साथ रुखा व्यवहार करता हैं। वह उनके साथ एक सामान्य अधिकारी की तरह बातें करता हैं। परिणाम ये होता हैं कि उनका फल भी उसी तरह से मिलता हैं। अभिभावक अपने बचाव होती पेड़ कि दो टहनियां तोड़कर उसे ही मिटटी से baandhkar
शिक्षक को देता हैं ओर अधिकारिक परेसनियोंसे अपने को बचाता हैं। उनका उस शिक्षक के प्रति दृष्टिकोण भी hamesha के लिए badal जाता हैं ।
एक शिक्षिका एक गरीब लड़की पर गुस्सा हो रही थी। सामान्य जन के लिए कभी कभी पेड़ लाना कठिन होता हैं। लेकिन उस लड़की के पिता ने बहुत प्यार से नीम के ५-६ पौधे लेकर आये थे। शिक्षिका उसपर गुस्सा कर रही theen, वो बोल रही थी, क्या तुम्हे पेड़ ओर पौधे में अंतर नहीं पता हैं। बेचारी कुछ बोल नहीं पा रही थी। दर से सहमी हुई थी। वही पास में मेरी दीदी सबकुछ देख रही थी। उसका मन प्रतिक्रिया से भरा जा रहा था। लेकिन उस समय वह बीमार थी। इसलिए कुछ बोल नहीं पा रही थी। आवेश में आने के बाद फिर वो किसी की नहीं सुनती। लेकिन वो बहुत बीमार थी। उसने बस मेरे जीजाजी को बोली, उस शिक्षिका को दो नीम का बड़ा पेड़ उखाड़ के दे दीजिए ओर फिर बताइए कि पेड़ ओर पौधा क्या होता हैं। मैं अपनी दीदी को अछ्छी तरह जनता हूँ। उसे इसतरह के स्वाभाव पसंद नहीं करती। बचपन से ही वो अपने शिक्षकों, अधिकारीयों को सीधा कर चुकी हैं। अपने महाविद्यालय me प्रोफेस्सोर्स को bhi माफ़ी mangne पर majboor कर देती थी। ओर बात भी छोटी हुआ करती थी। पान खाकर वर्ग में आना, तम्बखून खाना ये सब उसे बिलकुल पसंद नहीं था ओर शिक्षक भी मेरी दीदी से छिपकर ही ये सब कम करते थे। लेकिन अपने ही शिक्षक को जब मैं कटघरे में खड़ा पाया तो निश्चित रूपेण बहुत दुःख हुआ।
बच्चों के अभिभावक आज का समाज हैं, शिक्षक कल के समाज कि ओर देखता हैं। उन्हें संयम से काम लेना चाहिए। जो अभिभावक पेड़ लेकर नहीं आये, उन्हें मृदु स्वर में समझाना चाहिए था ओर उनको अपनी अपेक्षा दिखानी चाहिए कि वे फिर कभी आकर पेड़ दे जाएँ। मेरा ये विश्वास हैं कि सभी लोग एक बार नहीं बार बार आकर पेड़ दे जायेंगे। वे पेड़ लगा भी देंगे।
Kaash वही शिक्षक उसी nishtha से छात्रों के bhavishya sanwarne के लिए jagrook होता, तो मेरे विद्यालय का swaroop कुछ ओर होता।
शिक्षक से मेरा anurodh हैं, वो अपने maryada ओर अपने dayitva को samajhe ओर बच्चों में achhe sanskar bharkar desh के karya hetu agrasar karen। tabhi apna bharat sitaron की तरह duniya में jagmag karegi।
मैं अपने katu vachano के लिए dukhi हूँ लेकिन मैं अपने bharat mata के लिए chup भी तो नहीं rah sakta। ab chhatra नहीं रहा, ab मैं एक शिक्षक ban chuka हूँ। bharat ma के sundar bhavishya कि कल्पना मेरे मन mastishk में हैं। ये shashya-shyamala dharati फिर से एक din lahrayegi। hamare kishan का जीवन फिर से sukhmay hoga ओर समाज में वे भी vishesh adar के patra honge।

Sunday, August 8, 2010

How to promote cultural activities in schools



Cultural activities keep charged humans. It nurtures the talent of participants and inculcates innovative attitude. It coloured the evening and help audience exhilarate. Drama, music, dance are different dimensions of cultural activities. The performance of students on stage decides the liveliness of a school or an organization. Each school should promote these activities and work for continuous improvement of the level of the activities. There should be a group of people always ready to perform on stage. So let's come and try to ffocus, how we could promote cultural activities in school.




1. There should be a room or place, where students willing to learn and perform gather regularly. Compartmentalize the room and decorate accordingly. In music section, there should be poster of great musicians. Name and picture of instruments should be posted there. Similarly in drama section, similar arrangement should be made. There should be kept a rack with different section. Name the section as drama, music and put related books in the respective sections.


2. Regular practice. It is essential. A group of students consisting of various class should gather everyday for a few hours. They should practice there. Elders should act as mentors to their juniors. This will help in flowing of talent and with time will improve the quality of level of cultural ativities.


3. Stage performace.. They all should get chance to perform for two three hours on stage every month. Each team should consist of students of different class. Avoid class performace and promote group performance.


4. Grand performance: With the help of local people, try to organize cultural evening in nearby village. This will increase the repo of school.


5. The performace record of students should be maintained. Even the students passed out from school, he should have concern about the group. They should extend help to the students for promoting music in school by giving gift in the form of musical instruments.


सांस्कृतिक कार्यक्रम वातावरण को जीवंत बनती हैं। जहाँ एक तरफ छात्रों को कुछ नया करने का अवसर देती हैं, वही उन्हें साथ में हँसते हुए जीने की कला भी सिखाती हैं। किसी को यदि संगीत से प्यार हो जाये तो फिर वह संगीत के बिना जिन्दा नहीं रह सकता हैं। आज विद्यालयों में जहा छात्रगन व्यर्थ के बातों में समय बिताते हैं, एक वर्ग के छात्र दुसरे वर्ग के छात्रों से लड़ाई करने में अपना समय गवाते हैं। इन सबसे विद्यालय का माहौल ख़राब होता हैं। छात्रो को पढने में मन नहीं लगता और फिर वे बड़ों का अनादर करना शुरू कर देते हैं। विद्यालय से निकलने के बाद वे medha के आभाव में अच्छा काम नहीं कर पाते और फिर समाज का वातावरण भी ख़राब करते हैं।
संगीत, कला, साहित्य, नाटक इत्यादि छात्रों को हमेशा कुछ नया करने और दिखाने का मौका देती हैं, वही वह उन्हें पढ़ने के लिए भी प्रेरित करती हैं। शिक्षक के संसर्ग में रहने से उन्हें बड़ों का आदर करने की आदत पड़ती हैं। ऐसे छात्र यदि आज के प्रतियोगिता में भले ही पिछड़ जाये, लेकिन जीवन के दौड़ में वे आगे निकल जाते हैं। जहाँ भी जायेंगे जिंदादिल रहेंगे और अपने कला के प्रभाव से सबको जिंदादिल बनायेंगे। इसीलिए किसी भी विद्यालय में संगीत शिक्षक का बड़ा महत्व होता हैं और उन्हें पूरी निष्ठां से काम भी करना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए की उनके कार्य के कारन छात्र ही नहीं वरण सम्पूर्ण समाज ही सुन्दर बनता हैं।

कला, साहित्य ये जीवन को सुन्दर बनाने के साथ साथ संस्कृति का वाहक भी होती हैं। हम इन माध्यमों के द्वारा अपने महान संस्कृति का चित्रण करते हैं साथ में उन लोगों को भी याद करते हैं; जिन्होंने हमारे लिए, अपने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान हँसते हुए कर दिया। इस तरह से संगीत शिक्षक संसकिरती का धरोहर भी होता हैं।