शिक्षक समाज का निर्माता होता हैं, और इस नाते उन्हें समाज का द्रष्टा भी होना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों की समझ के साथ-साथ, उसका उचित आंकलन करने की क्षमता होनी चाहिए। इसी आधार पर वे छात्रों का उचित मार्गदर्शन कर सकेंगे। आज के समाज की कमियों को दूर कर ही कल के नवीन समाज की संरचना हो सकेगी। छात्र नवीन जीवन की कल्पना करे और उसे यथार्थ करने के लिए संकल्पित हो, तभी नवीन समाज की हो payegi।
शिक्षक का व्यवहार मधुर व आदरणीय होना चाहिए। शिक्षक अपने स्वाभाव se स्वतः जनसामान्य se आदर पा लेगा। दुःख होता हैं, जब जनसामान्य शिक्षकों के स्वभाव पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता हैं। दिनांक ९/०८/२०१० को मेरे विद्यालय में नए छात्रों का दाखिला लिया गया। वृक्षारोपण के लिए सभी नए छात्रों से यह अपेक्षा की जाती हैं कि वे अपने साथ दो-दो पेड़ लेकर आये। परिश्थितियां जो भी हो, कुछ लोग बिना पेड़ लिए ही जाते हैं, तो कोई एक ही पेड़ लता हैं। यह दृश्य देखकर कष्ट तो होता हैं।
लेकिन ये सुनकर ओर भी कष्ट होता हैं जब कोई शिक्षक अभिभावक के साथ रुखा व्यवहार करता हैं। वह उनके साथ एक सामान्य अधिकारी की तरह बातें करता हैं। परिणाम ये होता हैं कि उनका फल भी उसी तरह से मिलता हैं। अभिभावक अपने बचाव होती पेड़ कि दो टहनियां तोड़कर उसे ही मिटटी से baandhkar
शिक्षक को देता हैं ओर अधिकारिक परेसनियोंसे अपने को बचाता हैं। उनका उस शिक्षक के प्रति दृष्टिकोण भी hamesha के लिए badal जाता हैं ।
एक शिक्षिका एक गरीब लड़की पर गुस्सा हो रही थी। सामान्य जन के लिए कभी कभी पेड़ लाना कठिन होता हैं। लेकिन उस लड़की के पिता ने बहुत प्यार से नीम के ५-६ पौधे लेकर आये थे। शिक्षिका उसपर गुस्सा कर रही theen, वो बोल रही थी, क्या तुम्हे पेड़ ओर पौधे में अंतर नहीं पता हैं। बेचारी कुछ बोल नहीं पा रही थी। दर से सहमी हुई थी। वही पास में मेरी दीदी सबकुछ देख रही थी। उसका मन प्रतिक्रिया से भरा जा रहा था। लेकिन उस समय वह बीमार थी। इसलिए कुछ बोल नहीं पा रही थी। आवेश में आने के बाद फिर वो किसी की नहीं सुनती। लेकिन वो बहुत बीमार थी। उसने बस मेरे जीजाजी को बोली, उस शिक्षिका को दो नीम का बड़ा पेड़ उखाड़ के दे दीजिए ओर फिर बताइए कि पेड़ ओर पौधा क्या होता हैं। मैं अपनी दीदी को अछ्छी तरह जनता हूँ। उसे इसतरह के स्वाभाव पसंद नहीं करती। बचपन से ही वो अपने शिक्षकों, अधिकारीयों को सीधा कर चुकी हैं। अपने महाविद्यालय me प्रोफेस्सोर्स को bhi माफ़ी mangne पर majboor कर देती थी। ओर बात भी छोटी हुआ करती थी। पान खाकर वर्ग में आना, तम्बखून खाना ये सब उसे बिलकुल पसंद नहीं था ओर शिक्षक भी मेरी दीदी से छिपकर ही ये सब कम करते थे। लेकिन अपने ही शिक्षक को जब मैं कटघरे में खड़ा पाया तो निश्चित रूपेण बहुत दुःख हुआ।
बच्चों के अभिभावक आज का समाज हैं, शिक्षक कल के समाज कि ओर देखता हैं। उन्हें संयम से काम लेना चाहिए। जो अभिभावक पेड़ लेकर नहीं आये, उन्हें मृदु स्वर में समझाना चाहिए था ओर उनको अपनी अपेक्षा दिखानी चाहिए कि वे फिर कभी आकर पेड़ दे जाएँ। मेरा ये विश्वास हैं कि सभी लोग एक बार नहीं बार बार आकर पेड़ दे जायेंगे। वे पेड़ लगा भी देंगे।
Kaash वही शिक्षक उसी nishtha से छात्रों के bhavishya sanwarne के लिए jagrook होता, तो मेरे विद्यालय का swaroop कुछ ओर होता।
शिक्षक से मेरा anurodh हैं, वो अपने maryada ओर अपने dayitva को samajhe ओर बच्चों में achhe sanskar bharkar desh के karya hetu agrasar karen। tabhi apna bharat sitaron की तरह duniya में jagmag karegi।
मैं अपने katu vachano के लिए dukhi हूँ लेकिन मैं अपने bharat mata के लिए chup भी तो नहीं rah sakta। ab chhatra नहीं रहा, ab मैं एक शिक्षक ban chuka हूँ। bharat ma के sundar bhavishya कि कल्पना मेरे मन mastishk में हैं। ये shashya-shyamala dharati फिर से एक din lahrayegi। hamare kishan का जीवन फिर से sukhmay hoga ओर समाज में वे भी vishesh adar के patra honge।
लेकिन ये सुनकर ओर भी कष्ट होता हैं जब कोई शिक्षक अभिभावक के साथ रुखा व्यवहार करता हैं। वह उनके साथ एक सामान्य अधिकारी की तरह बातें करता हैं। परिणाम ये होता हैं कि उनका फल भी उसी तरह से मिलता हैं। अभिभावक अपने बचाव होती पेड़ कि दो टहनियां तोड़कर उसे ही मिटटी से baandhkar
शिक्षक को देता हैं ओर अधिकारिक परेसनियोंसे अपने को बचाता हैं। उनका उस शिक्षक के प्रति दृष्टिकोण भी hamesha के लिए badal जाता हैं ।
एक शिक्षिका एक गरीब लड़की पर गुस्सा हो रही थी। सामान्य जन के लिए कभी कभी पेड़ लाना कठिन होता हैं। लेकिन उस लड़की के पिता ने बहुत प्यार से नीम के ५-६ पौधे लेकर आये थे। शिक्षिका उसपर गुस्सा कर रही theen, वो बोल रही थी, क्या तुम्हे पेड़ ओर पौधे में अंतर नहीं पता हैं। बेचारी कुछ बोल नहीं पा रही थी। दर से सहमी हुई थी। वही पास में मेरी दीदी सबकुछ देख रही थी। उसका मन प्रतिक्रिया से भरा जा रहा था। लेकिन उस समय वह बीमार थी। इसलिए कुछ बोल नहीं पा रही थी। आवेश में आने के बाद फिर वो किसी की नहीं सुनती। लेकिन वो बहुत बीमार थी। उसने बस मेरे जीजाजी को बोली, उस शिक्षिका को दो नीम का बड़ा पेड़ उखाड़ के दे दीजिए ओर फिर बताइए कि पेड़ ओर पौधा क्या होता हैं। मैं अपनी दीदी को अछ्छी तरह जनता हूँ। उसे इसतरह के स्वाभाव पसंद नहीं करती। बचपन से ही वो अपने शिक्षकों, अधिकारीयों को सीधा कर चुकी हैं। अपने महाविद्यालय me प्रोफेस्सोर्स को bhi माफ़ी mangne पर majboor कर देती थी। ओर बात भी छोटी हुआ करती थी। पान खाकर वर्ग में आना, तम्बखून खाना ये सब उसे बिलकुल पसंद नहीं था ओर शिक्षक भी मेरी दीदी से छिपकर ही ये सब कम करते थे। लेकिन अपने ही शिक्षक को जब मैं कटघरे में खड़ा पाया तो निश्चित रूपेण बहुत दुःख हुआ।
बच्चों के अभिभावक आज का समाज हैं, शिक्षक कल के समाज कि ओर देखता हैं। उन्हें संयम से काम लेना चाहिए। जो अभिभावक पेड़ लेकर नहीं आये, उन्हें मृदु स्वर में समझाना चाहिए था ओर उनको अपनी अपेक्षा दिखानी चाहिए कि वे फिर कभी आकर पेड़ दे जाएँ। मेरा ये विश्वास हैं कि सभी लोग एक बार नहीं बार बार आकर पेड़ दे जायेंगे। वे पेड़ लगा भी देंगे।
Kaash वही शिक्षक उसी nishtha से छात्रों के bhavishya sanwarne के लिए jagrook होता, तो मेरे विद्यालय का swaroop कुछ ओर होता।
शिक्षक से मेरा anurodh हैं, वो अपने maryada ओर अपने dayitva को samajhe ओर बच्चों में achhe sanskar bharkar desh के karya hetu agrasar karen। tabhi apna bharat sitaron की तरह duniya में jagmag karegi।
मैं अपने katu vachano के लिए dukhi हूँ लेकिन मैं अपने bharat mata के लिए chup भी तो नहीं rah sakta। ab chhatra नहीं रहा, ab मैं एक शिक्षक ban chuka हूँ। bharat ma के sundar bhavishya कि कल्पना मेरे मन mastishk में हैं। ये shashya-shyamala dharati फिर से एक din lahrayegi। hamare kishan का जीवन फिर से sukhmay hoga ओर समाज में वे भी vishesh adar के patra honge।
